होली कि तरंग

होली कि तरंग का,

चढा है रंग ऐसा कुछ,

बिना ही पिए भंग,

होली सर चढ आई है.
रंगों में, गुलाल में,

होली कि सुरताल में,

भूले घर-बार-द्वार,

अपने सब भाई है.

 

होली कि फाग- राग में,

गाये मतवाला मन,

मतवाले मन कि ही,

होली में सुनवाई है.

 

होली के जूनून में,

भंग-रंग भूले सभी,

कक्का पर हमारे जैसे,

चढ़ी तरुणाई है.

 

हो नीले, पीले, लाल,

रंग है अनेक सब पर,

प्यार के ही रंग ने तो,

दुनिया भुलाई है,

 

गारी के बिना कहाँ

होली कि बहार आये

होली के खुमार में तो,

होती जगहँसाई है.

 

बृज के गोपाल कि,

होरी तब ही होती पूरी,

राधा के रंगों से,

होती जब रंगाई है.

 

बरसाने कि होली में,

चढ़ता है रंग तब ही,

गोपियों के डंडों से,

होती जब पिटाई है.

 

होली के रंगों में रंग है,

सारा ही अपना ग्रुप,

कहाँ रुकता है जग,

ये तो बस अंगडाई है.

 

होली के मतवालों कि,

दिन-रात होती होली है,

यहाँ कभी होती नहीं,

होली कि विदाई है.

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धूप


शहर में /

धूप के गहने /

कोई और चुरा लेता है /

गगनचुम्बी /

ईमारत की ओर से झांकती /

एक टुकड़ा धूप /

घर के दरवाजे पर /

दस्तक देती है /

खिडकी से अंदर आने की /

कोशिश करती है /

असफल /

शहर में /

धूप के बिछोने  /

कोई ओर बिछा लेता है /

चाहरदीवारी में /

कैद हुई धूप /

टुकडो में बंट गई /

किसी ओर के हिस्से की /

धूप /

किसी ओर के घर  /

रुक गई /

शून्य

कविता

सूख गई है पहूँच समुन्दर पर मन सरिता,

घोर निराश की गर्मी, गुम हुई मौलिकता

शून्य हुये विश्वाश अंधेरो की सत्ता है,

कैसे लिखू विचारों के बिन मैं कोई कविता.

 

कटे हुए है हाथ-पैर, विकलांग पढ़ाईं,

रटे हुए  शब्दो की मस्तिष्क  चढ़ाई

नक़ल बन गई, नैतिकता की सृजन संहिता

कैसे लिखू बिचारों के बिन मैं कोई कविता.

 

पल-पल की लगती है हर पल एक कीमत,

प्यार-घृणा – अवशेष रही बस धन की चाहत.

धन के दीवानेपन्  में खोई बुद्धिमत्ता,

कैसे लिखू बिचारों के बिन मैं कोई कविता.

 

तनाव के धागों पे लटकी है जिंदगी

पल पल की चिंता में जलती है जिंदगी

शमशान हुए कागज, कलम बनी है चिता

कैसे लिखू बिचारों के बिन मैं कोई कविता.

 

न खुशी रही है खुशी, न गम में भी मजा है

यांदें छूटी, भूत हुआ गम, वर्तमान भी बनी सजा है

रिसते घट से, निश्चित भविष्य भी दिखता रीता

कैसे लिखू बिचारों के बिन मैं कोई कविता.

विवश

ख्वाहिशों की संख्याएं, हर बार हुई दूनी.

अरमानो की राह पर, सदा रही सूनी.

धुयें के दरवाजे पर दस्तक देता मन,

रोक न् पाई पर खुदी, किस्मत की होनी.

रौशनी के धागों से बंधे, पल के हाथ,

 

ढूंढ न् पायें कर मेरे, मंजिल अनजानी.

आशाओं की सीढियाँ, चढ़ते कल के पैर,

मंजिल की ऊँचाईयाँ, हो न् पाई बौनी.

भूलों की चादर घनी, ढकती रही प्रयास,

बुद्धि चढ़ी ख्याव पर, मिली सदा हानि.

मेरी नज़र से

मेरी नज़र से

आशीष